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निकम्‍मी नहीं, लुटेरी है सरकार

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Cartoon by IRFAN

दिल्‍ली सरकार निकम्‍मी नहीं है, खूब काम कर रही है। काम ऐसा जिसे देखकर लुटेरे भी पानी-पानी हो रहे हैं। वो महंगाई के साथ मिलकर खिलवाड़ कर रही है। दोनों मिलकर आम जनता को गुदगुदाने का खेल, खेल रहे हैं। जो लुटने से बच जाता है, वो कॉमनमैन नहीं होता है। उसका न लुटना ही उसके कॉमनमैन न होने का पुख्‍ता सबूत है।  कॉमनमैन के लिए लुटना कंपल्‍सरी है। सरकार से लुटने के अनेक फायदे हैं। सरकार चाकू नहीं मारती है, वो मुर्गी नहीं काटती, अंडे सहेजती है, फिर इकट्ठे कर बाजार में बेचती है। आम आदमी को मार दिया गया तो सरकार की वे योजनाएं, जो आम आदमियों के लिए हैं, धरी की धरी रह जायेंगी।

सरकार आपको खिलाने के लिए उद्यत है पर आप खेलों के प्रति उदासीन हैं, वो इसे भांप खेलों का आयोजन कर देती है। सरकार को आम जनता के स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता है, इसलिए जो खेल नहीं पाते हैं, या खेलते तो हैं पर लोहे तक के पदक नहीं लाते हैं, उनके लिए खेलों का आयोजन करना सबके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मुफीद बताया गया है। इससे इनसे जुड़े लोगों की जेबों की तबीयत चंगी रहती है। सरकार लुटेरों से लबालब है। सरकार शराफत से जब, जेब काटती है,पब्लिक जिंदा रहकर भी, मरे हुए से बदतर हो जाती है। सरकार धीरे-धीरे करके निरंतर लूटती रहती है। जैसे सांस ले रही हो। सरकार की हर सांस में, पब्लिक को पग-पग पर लूटने का अटूट विश्‍वास है।
जिस देश की सरकार लुटेरी हो, वो निकम्‍मी नहीं हो सकती। सरकार रिस्‍क ले लेती है, वो जानती है कि पब्लिक इस लूट की एफआईआर नहीं लिखवाएगी।  लुटने-लूटने की विभिन्‍न वैरायटियां हैं। पुलिस, ट्रैफिक पुलिस, इंकम टैक्‍स, सेल टैक्‍स, अलां टैक्‍स और फलां टैक्‍स।  सब्‍जी-दाल खाने वालों को उसे बेचने वाले लूटते हैं, जो किसान हैं उन्‍हें वाजिब लेने का अधिकार भी नहीं है। रेलवे स्‍टेशनों पर लूटने के लिए चौकस हैं कुली। अस्‍पतालों में मरीजों को डॉक्‍टर लूटते हैं। कहीं से आ रहे हैं तो सबसे पहले आपको स्‍टेशन पर घात लगाए शातिर कुलियों, तिपहिया चालकों से चार-दो होना पड़ेगा। इसी बीच हो सकता है कि कोई आपका ध्‍यान बंटाकर आपका सामान भी साफ कर दे। आप कहेंगे कि हमें सामान साफ करवाने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि ट्रेन में धूल नहीं उड़ नहीं रही थी, पर धूल झोंकने के लिए धूल झाड़ना जरूरी है।
लुटेरों को अंग्रेजी सिखाई जा रही है, जिससे आप हीनता के शिकार न हों कि पहले देश को अंग्रेजों ने अंग्रेजी के सहारे लूटा तथा मुगलों ने उर्दू के दम पर और आपको हिन्‍दी के भरोसे लुटने के लिए छोड़ दिया गया।  लुटेरों के व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए भी क्‍लासें लगाई जा रही हैं,ताकि लुटते हुए आपको लुटने का विशिष्‍ट अहसास हो।

दिल्‍ली सरकार निकम्‍मी नहीं है, खूब काम कर रही है। काम ऐसा जिसे देखकर लुटेरे भी पानी-पानी हो रहे हैं। वो महंगाई के साथ मिलकर खिलवाड़ कर रही है। दोनों मिलकर आम जनता को गुदगुदाने का खेल, खेल रहे हैं। जो लुटने से बच जाता है, वो कॉमनमैन नहीं होता है। उसका न लुटना ही उसके कॉमनमैन न होने का पुख्‍ता सबूत है।  कॉमनमैन के लिए लुटना कंपल्‍सरी है। सरकार से लुटने के अनेक फायदे हैं। सरकार चाकू नहीं मारती है, वो मुर्गी नहीं काटती, अंडे सहेजती है, फिर इकट्ठे कर बाजार में बेचती है। आम आदमी को मार दिया गया तो सरकार की वे योजनाएं, जो आम आदमियों के लिए हैं, धरी की धरी रह जायेंगी।

सरकार आपको खिलाने के लिए उद्यत है पर आप खेलों के प्रति उदासीन हैं, वो इसे भांप खेलों का आयोजन कर देती है। सरकार को आम जनता के स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता है, इसलिए जो खेल नहीं पाते हैं, या खेलते तो हैं पर लोहे तक के पदक नहीं लाते हैं, उनके लिए खेलों का आयोजन करना सबके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मुफीद बताया गया है। इससे इनसे जुड़े लोगों की जेबों की तबीयत चंगी रहती है। सरकार लुटेरों से लबालब है। सरकार शराफत से जब, जेब काटती है,पब्लिक जिंदा रहकर भी, मरे हुए से बदतर हो जाती है। सरकार धीरे-धीरे करके निरंतर लूटती रहती है। जैसे सांस ले रही हो। सरकार की हर सांस में, पब्लिक को पग-पग पर लूटने का अटूट विश्‍वास है।

जिस देश की सरकार लुटेरी हो, वो निकम्‍मी नहीं हो सकती। सरकार रिस्‍क ले लेती है, वो जानती है कि पब्लिक इस लूट की एफआईआर नहीं लिखवाएगी।  लुटने-लूटने की विभिन्‍न वैरायटियां हैं। पुलिस, ट्रैफिक पुलिस, इंकम टैक्‍स, सेल टैक्‍स, अलां टैक्‍स और फलां टैक्‍स।  सब्‍जी-दाल खाने वालों को उसे बेचने वाले लूटते हैं, जो किसान हैं उन्‍हें वाजिब लेने का अधिकार भी नहीं है। रेलवे स्‍टेशनों पर लूटने के लिए चौकस हैं कुली। अस्‍पतालों में मरीजों को डॉक्‍टर लूटते हैं। कहीं से आ रहे हैं तो सबसे पहले आपको स्‍टेशन पर घात लगाए शातिर कुलियों, तिपहिया चालकों से चार-दो होना पड़ेगा।

इसी बीच हो सकता है कि कोई आपका ध्‍यान बंटाकर आपका सामान भी साफ कर दे। आप कहेंगे कि हमें सामान साफ करवाने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि ट्रेन में धूल नहीं उड़ नहीं रही थी, पर धूल झोंकने के लिए धूल झाड़ना जरूरी है।लुटेरों को अंग्रेजी सिखाई जा रही है, जिससे आप हीनता के शिकार न हों कि पहले देश को अंग्रेजों ने अंग्रेजी के सहारे लूटा तथा मुगलों ने उर्दू के दम पर और आपको हिन्‍दी के भरोसे लुटने के लिए छोड़ दिया गया।  लुटेरों के व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए भी क्‍लासें लगाई जा रही हैं,ताकि लुटते हुए आपको लुटने का विशिष्‍ट अहसास हो।

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9 Comments »

  • Shah Nawaz said:

    हा हा हा….
    खूब उधेडा है सरकार को अविनाश जी… क्या कहें, यह राजनीति है ही ऐसी चीज़…

  • Rakesh Kumar said:

    Ati Sunder, Bebak.
    Jarurat hai badlaw ki uper satah per taki aam admi bhukh aur vrastachar ke mar se bach nikle.
    Rakesh Kumar
    M.: 9278003889

  • Janisa said:

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  • wbhirsbgzke said:

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  • mucknfcjp said:

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