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भारत में फैलता एन.जी.ओ. का बाजार

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आजकल भारत में एन.जी.ओ. खोलना एक व्यवसाय हो गया है। हर व्यक्ति किसी-न-किसी बहाने एन.जी.ओ. खोलता है और फंडिंग के लिए बड़े-बड़े दावे करता है। हाल के दिनों में देश भर में एन.जी.ओ. संस्थाओं की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। मार्च 2005 की रिपोर्ट के अनुसार इनकी संख्या 15 लाख थी। ये सब मिलकर 30 हजार करोड़ रुपये हैंडल कर रहे थे। यह राशि विभिन्न कार्यक्रमों के लिए संस्थाओं को सरकारी, गैर सरकारी एवं अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से मिलती हैं। इस आधार पर देखा जाय तो भारत को एक सुखी एवं समृद्ध राष्ट्र होना चाहिए। पर यदि ऐसा नहीं है तो जरूर दाल में कुछ काला है। गरीबी-उन्मूलन, शिक्षा-प्रसार, स्वास्थ्य-सेवाओं, धार्मिक कार्यों सहित तमाम कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर चल रहे इन एन.जी.ओ. का नेटवर्क सिर्फ देश ही नहीं विदेशों में भी फैला है, जहाँ से उन्हें धमार्थ-कल्याणार्थ-परोपकरार्थ डॉलरों में सहायता मिलती है। इन संस्थाओं पर आर्थिक कृपा करने वालों में व्यक्तिगत दानियों का नाम सबसे ऊपर है। ब्रिटेन में एक विदेशी एनजीओ की ओर से किए गए एक आंतरिक अध्ययन के मुताबिकए निजी तौर पर दिया दान सबसे बडा़ आर्थिक स्त्रोत रहा है। इन दाताओं के बूते सन 2005 में 2,200 करोड़ से 8,100 करोड़ रुपए संस्थाओं पर न्यौछावर किए जाने का अनुमान लगाया गया । फिलहाल जो अनुमान मिल रहे हैं उसके अनुसार एन.जी.ओ. और गैर-लाभान्वित संस्थाओं ने सालाना 40 हजार करोड़ से 80 हजार करोड़ रुपए इमदाद के जरिए जुटाए हैं। इनके लिए सबसे बडी़ दानदाता सरकार है जिसने ग्या़रहवीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक क्षेत्र के लिए 18 हजार करोड़ रुपए रखे। इसके बाद विदेशी दानदाताओं का नंबर आता है। सन 2007-08 में इन एन.जी.ओ. ने 9,700 करोड़ दान से जुटाए। तकरीबन 1600-2000 करोड़ रुपए धार्मिक संस्थाएं खोलने के लिए दान में दिए गए। ऐसी संस्थाओं में तिरुमला तिरुपति देवास्थानम का नाम भी लिया जाता है, जिन्हें दान में प्रचुर धन ही नहीं हीरे-जवाहरात भी मिलते हैं।

यह आश्चर्यजनक पर सच है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा सक्रिय गैर-सरकारी, गैर-लाभन्वित संगठन भारत में हैं। पीपुल्स रिसर्च इन एशिया (पी॰आर॰आइ॰ए॰) ने अपने एक अध्ययन के बाद देश भर में 12 लाख एन.जी.ओ. को सूचीबद्ध किया था, जिनके बीच करीब 18 हजार करोड़ रुपये का मोबलाइजेशन हुआ। इन संस्थाओं में से 26.5 फीसदी धार्मिक गतिविधियों में 21.3 फीसदी सामुदायिक व सामाजिक सेवा कार्यों में फीसदी शिक्षा के क्षेत्र में, 18 फीसदी खेलकूद एवं कला-संस्कृति में तथा 6.6 फीसदी स्वास्थ्य के क्षेत्र में व शेष अन्य क्षेत्रों में कार्यरत थीं। भारत सरकार के योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश भर में केंद्र एवं राज्य सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से संबद्ध 30 हजार एन॰जी॰ ओ॰ सूचीबद्ध हैं। सरकार की ओर से कराए गए एक अन्य अध्ययन में बीते साल तक इन संस्थाओं की संख्या 30,30,000 (तीस लाख तीस हजार) तक पहुँच चुकी थी अर्थात 400 से भी कम भारतीयों के पीछे एक एन.जी.ओ। यह तादाद देश में प्राथमिक विद्यालयों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से कई गुना ज्यादा है। इस अध्ययन के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 4.8 लाख, आंध्रप्रदेश (4.6 लाखद्), उत्तर प्रदेश (4.3 लाख), केरल (3.3 लाख), कर्नाटक (1.9 लाख), तमिलनाडु (1.4 लाख), ओडीशा (1.3 लाख) और राजस्थान में 1 लाख एन.जी.ओ. पंजीकृत हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अस्सी फीसदी से ज्यादा पंजीकरण दस राज्यों से हैं। इन संगठनों की असली संख्या और भी ज्यादा हो सकती है क्योंकि यह ब्यौरा तो मात्र उन संस्थाओं का है जो सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 या मुंबई पब्लिक ट्रस्ट एक्ट या दूसरे राज्यों में समकक्ष एक्ट के तहत पंजीकृत की जा चुकी हैं। गौरतलब है कि ये संस्थाएं कई कानूनों के तहत पंजीकृत की जा सकती हैं। इनमें से प्रमुख हैं- सोसाइटीज एक्ट 1860, रिलिजियस इनडाउमेंट एक्ट 1863, इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882, द चैरिटेबल एंड रिलिजियस ट्रस्ट एक्ट 1920, द मुसलमान वक्फ एक्ट 1923, पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950, इंडियन कंपनीज एक्ट 1956 ;दफा 25द्ध इत्यादि।

पिछले दशकों में जिस तरह से गैर-सरकारी संगठनों यानी एन.जी.ओ. की तादाद बढी़ हैए उसी अनुपात में दानी बढे़ हैं। स्पष्ट है कि भारत में एन.जी.ओ. खोलने और उसके नाम पर वारे-न्यारे करने का बाजार भी बढ़ रहा है। सरकार से पैसे मिलने लगे तो संस्थाएं भी बनने लगीं। एन॰ जी॰ ओ॰ की संख्या बढ़ाने में सेवानिवृत लोगों का बड़ा हाथ है। इनमें ज्यादातर संस्थाएं कागजी हैं, जो न तो काम करने वाली हैं और न ही टिकाऊ। हाल ही में विदेश से आने वाले पैसे पर नजर रखने के लिए सरकार ने विदेशी उपदाय (विनियमन) विधेयक में इसका प्रावधान भी किया है। इसे राज्य सभा ने पारित भी कर दिया है। इस विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि इस समय देश में 40 हजार संगठन विदेशी पैसा हासिल कर रहे हैं। इन्हें 10 हजार करोड़ से ज्यादा पैसा मिला है पर आधे संगठनों ने ही सरकार को इसकी जानकारी व अपने खाते उपलब्ध कराए हैं। उनका कहना था कि इस प्रावधान के बाद विदेशी मदद करने वाले संगठनों को सरकार से इसकी इजाजत लेनी पड़ेगी। दुर्भाग्यवश सरकार सिर्फ निबंधन करती है, संस्थाएं क्या कर रही है, इससे मतलब नहीं होता। ऐसे में इन एन.जी.ओ. में प्रतिबद्धता की भी कमी झलकती है। आँकडों पर गौर करें तो सन 1970 तक महज 1.44 लाख पंजीकृत संस्थाएँ थीं वहीँ अगले तीन दशकों में बढ़कर क्रमशरू 1.79, 5.52 और 11.22 लाख हो गईं। वर्ष 2000 में सबसे ज्यादा संस्थाएँ पंजीकृत हुई। हालांकि अपने देश भारत में निजी क्षेत्र की कंपनियाँ बडे़ दानियों के रुप में सामने नहीं आई हैं। वे इस तरह के सामाजिक कामों के लिए अपने मुनाफे का एक फीसदी से भी कम दान में देती हैं। जबकि ब्रिटेन और अमेरिका में निजी क्षेत्र की कंपनियाँ मुनाफे का डेढ़ से दो फीसदी तक भलाई और धर्मार्थ काम के लिए दान देती हैं। ऐसे में भारत में निजी क्षेत्र की कंपनियों को जनकल्याण के लिए अभी जागना है। वहीं यह भी जरूरी हो गया है कि इन तमाम एन.जी.ओ. इत्यादि की सोशल-आडिटिंग भी कायदे से सुनिश्चित किया जाय ताकि जनकल्याण के नाम पर एन.जी.ओ. खोलकर अपना कल्याण करने की प्रवृति दूर हो सके।

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11 Comments »

  • Ghanshyam Maurya said:

    समाज में एक ऐसा तबका उभर रहा है जो सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग करके धन कमाने में लगा है। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्‍वयन में कुछ आधारभूत कमियां हैं जिन्‍हें दूर करने की जरूरत है। साथ ही एनजीओ को सरकारी अनुदान देने की पात्रता की शर्तें और कड़ी की जायें और उनका ऑडिट भी कराया जाये।

  • Ramesh Kumar Sirfiraa said:

    जब इनको स्टेज पर खड़े होकर बोलना पड़ता हैं. तब ऐसे-२ भाषण देते हैं कि-सुनने वाला सुनकर यह सोचने पर मजबूर हो जाता है. उपरोक्त श्रीमान से बड़ा तो कोई समाजसेवक कोई हैं ही नहीं. लेकिन जब उनसे किसी प्रकार की कोई मदद लेने जाओ तब बंगले झांकते नज़र आते हैं. मेरे पास ऐसे अनेकों अनुभव और पुख्ता सबूत हैं. इनकी बन्दर-बाँट में क्षेत्रीय संसद, विधायक और पार्षद तक शामिल होते हैं.

  • Ramesh Kumar Sirfiraa said:

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  • Shah Nawaz said:

    समाज सेवा के नाम पर पैसों की उगाही का धंधा बना लिया है इन तथाकथित एन. जी. ओज़ ने…

  • Ramesh Kumar Sirfiraa said:

    श्रीमान जी, क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार “”आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें”" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग http://www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

  • someshwardayalsharma said:

    koकुछ ngo मेरी नजर में एसे हैं जो सही मायने में अच्छी समाजसेवा कर रहे हैं लेकिन हमारे समाज में एइसे nGO को सम्मानित करना या उनका उत्साहवर्धन करना शायद हमारी प्रव्रत्ति नहीं, हम सिर्फ दुसरे की आलोचना करना ही जानते हैं .पर ये भी सच है की एक मछली पुरे तालाब को गन्दा कर देती है.

  • software control de flota said:

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