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Articles in the विचार-मंच Category

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उंगल-चिन्ह के निशानः

‘‘क्या मानव यह समझ रहा है कि हम उसकी हड़डियों को एकत्रित न कर सकेंगे ? क्यों नहीं ? हम तो उसकी उंगलियों के पोर õ पोर तक ठीक बना देने का प्रभुत्व रखते हैं।‘‘(अल-क़ुरआन: सूर:75 आयत. 3 से 4)
जो कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद मिटटी में मिल जाता है और उसकी हड़डियां तक ख़ाक में मिल जाती हैं तो यह कैसे सम्भव है कि ‘‘क़यामत के दिन उसके शरीर का एक – एक अंश पूनः एकत्रित हो कर पहले वाली जीवित अवस्था में वापिस आजाए ? और अगर ऐसा हो भी गया तो क़यामत के दिन उस व्याक्ति की ठीक-ठीक पहचान किस प्रकार होगी ? अल्लाह तआला ने उपर्युक्त …

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चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसको पढ़ो। सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो। तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा। यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है। विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव। डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है।

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सृष्टि का आरंभ कब हुआ? कैसे हुआ?

मनुष्य के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि सृष्टि का आरंभ कब हुआ? कैसे हुआ? हर मनुष्य के मन में उठता रहा है यह प्रश्न कि क्या कोई वस्तु बिना किसी बनाने वाले के बन सकती है? यह हमेशा से एक सवाल रहा की चाँद, सितारे, आकाशगंगाएं, पृथ्वी, पर्वत, जंगल, पशु, पक्षी, मनुष्य, जीव-जन्तु यह सब कहाँ से आए और कैसे बने?
मैं अल्लाह के अस्तित्व पे,उसकी किताबों पे यकीन रखता हूँ और यह कुछ बातें इस उम्मीद के साथ पेश कर रहा हूँ की लोग खुद भी यह फैसला कर सकें क्या सही है क्या गलत।
हज़रत अली (अ) से एक नास्तिक ने कहा: ऐ अली, …

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“अच्छे काम में सौ अड़ंगे” की सत्यता

“अच्छे काम में सौ अड़ंगे” वाली कहावत “अन्ना हजारे” के लोकपाल बिल में सत्य होती नजर आ रही है!
वैसे तो कभी इन नेताओ को विकास का नाम तक याद नहीं रहेगा क्योकि वास्तविक जीवन में इससे इनका कोई नता नहीं होता ये सब राजनैतिक जीवन की बातें होती है,लेकिन कोई अन्य किसी अच्छे कार्य के लिए कदम उठाये तो उसे पीछे हटाने की पूरी कोशिश करते है, और इस कम में सारे राजनैतिक प्रतिद्वंदी एक होते नजर आते है! इन सबकी यथार्थता के लिए हम नजर डालते है “अन्ना हजारे” के भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किये गए अभियान की, जिसमे लोकपाल बिल की मंजूरी महत्वपूर्ण थी या ये कहा जाये की ये पूरा अभियान लोकपाल …

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रिश्वत, रिश्वत और बस रिश्वत

इस रिश्वत की दुनिया मे, बच्चे का जन्म होते ही रिश्वत की शुरुवात होती है और जब वो बच्चा बुजुर्ग होकर मरता है तब भी रिश्वत का साथ तो होता ही है। इस रिश्वत की दुनिया मे आप कोई भी काम करने जाओ, आप से पहले रिश्वत वहां पहुँच जाती है। है न कमाल की बीमारी जो हर जगह फैली हुई है, यहाँ तक की जन्म के प्रमाण पत्र मे भी रिश्वत और मृत्यु के प्रमाण पत्र मे भी रिश्वत।
रिश्वत ने कर दिया प्रजा तंत्र को खोखला:
रिश्वत नाम की गंदगी से आप जितना भी भागना चाहो भागो, मगर ये बीमारी आपका पीछा नहीं छोडती है। क्योंकि हम भारत वासीयो ने रिश्वत की बीमारी को अपनी …

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घरेलू अपराधोँ मेँ समाज की भूमिका?

समाज अपनी आत्मा खो चुका है. वह किसके साथ खड़ा है?वह विचलित हो चुका है. वह जन्म, शादी, आदि अवसर पर जिन्दगी मेँ एक  दिन तो आशीर्वाद देना जानता है, लेकिन शेष जिन्दगी……..?
जिन्दगी भर समस्यावृद्धिकारक बन कर ही आता है. परिजन, आसपड़ोस, सम्बन्धी, आदि सब के सब बनी के यार होते जा रहे है. सामूहिकता मेँ जीने गुण समाप्त हो चुके हैँ, हाँ! अवगुण अवश्य विकराल होते जा रहे हैँ.अर्थात निज् स्वार्थ मेँ  समूह बनता बिगड़ता है.न्याय व ईमानदारी  चेहरा व हालात देख बनती बिगड़ती है.
घरेलू हिँसा के खिलाफ किधर से भी कोई व्यवहारिक कदम नहीँ रखे जा रहेँ. आसपड़ोस, सम्बन्धी  आदि मूक दर्शक बने रहे जाते हैँ, हाँ! बर्बादी मेँ सहायक तो जरुर हो सकते हैँ. अनेक घर की कहानी के अन्त …

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शिक्षा में कोचिंग का फैलता मायाजाल

यह वाकया है इलाहाबाद का…. एक बार एक किसान ने अपने बेटे को इलाहाबाद इस तमन्ना के साथ भेजा कि वह डॉक्टर बनेगा। बेटे ने इलाहाबाद जाते ही एक प्रमुख कोचिंग संस्था में प्रवेश लिया और पिताजी को पत्र द्वारा इसकी सूचना दी। उस भोले-भाले किसान पिता ने बेटे का पत्र पाते ही गाँव भर में मिठाई बाँट डाली कि मेरा बेटा डॉक्टरी वाले संस्थान में प्रवेश पा गया है और अब वह जल्दी ही डॉक्टर बन जायेगा। उसकी खुशी देख एक पढ़े- लिखे व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया- ‘‘भैया! अभी तो तुम्हारा लड़का चंद रोज पहले इलाहाबाद गया है और इतनी जल्दी कौन सी परीक्षा दे दी कि तुरन्त …

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सामाजिक दमन के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीकः डॉ अम्बेडकर

- बाल्यावस्था में कोई भी नाई आपके बाल काटने को तैयार नहीं था सो आप सहित सभी भाईयों का बाल माता जी ही काटा करती थीं।
- बाल्यावस्था में आप जब पूर्व भुगतान करके अपने अग्रज के साथ बैलगाड़ी में बैठकर गोरेगाँव रेलवे स्टेशन जा रहे थे तो रास्ते में बातचीत द्वारा गाड़ीवान को आपकी अछूत जाति का पता चला तो वह अपवित्र होने के भय से गाड़ी से उतर गया और आपके अग्रज बैलगाड़ी चलाकर स्टेशन तक ले गए तथा गाड़ीवान पीछे-पीछे पैदल चलता रहा।
- हाईस्कूल में आपको द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत नहीं वरन् फारसी पढ़नी पड़ी, क्योंकि अछूत बच्चों को संस्कृत की शिक्षा देना पाप समझा जाता था।
- अध्ययन-काल के दौरान जब …

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भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान!

बताया जा रहा है कि 400लाख करोड़ रुपये काला धन के रुप मे विदेश मे जमा है. यदि यह धन भारत आ जाए तो देश की स्थिति क्या होगी ?
 
देश के अन्दर 6 लाख 38 हजार 365 गाँव हैँ. यदि कैस भी यह काला धन भारत आ जाए और प्रत्येक गाँव को एक एक करोड़ ही रुपया दे दिया जाए तो गाँव का विकास सम्भव हो जाएगा. वापस आये इस काले धन से प्रत्येक गरीब परिवार के नाम पर अर्द्धसरकारी उपक्रम,कुटीर लघु उद्योग,आदि स्थापित कर भारत को पुन:सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है.
 
स्वामी रामदेव व उनके सहयोगियों के इस अभियान मे यदि देश के नागरिक सहयोग नही करते है तो यह भविष्य मे राष्ट्रीय …

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भारतीय संस्कृति में होली के विभिन्न रंग

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। त्यौहार जीवन के उत्सव हैं। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। शायद यही कारण है कि एक समय किसी धर्म विशेष के त्यौहार माने जाने वाले पर्व आज सभी धर्मों के लोग आदर के साथ हँसी-खुशी मनाते हैं। उत्सव जीवन की लय और निरंतरता बनाते हैं। उत्सव मनते रहें …